क्या है इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक एवं खगोलीय वैज्ञानिक महत्व एवं प्रमाण ।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और दुनिया भर की सभ्यताओं ने इसे अलग-अलग रूपों में प्रमाणित भी किया है,जैसे अगर हम बात करें प्राचीन कालीन भारतीय खगोल वैज्ञानिक पहलू की तो पाते हैं कि प्राचीन कालीन भारत में इसको ‘मेष संक्रांति’ एवम् प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान में इसे ‘बसंत संपात’ के नाम से भी जाना जाता था,हालांकि प्रीसेशन (Precession of Equinoxes) या अयन चलन के कारण अब यह तिथि बदल गई है, लेकिन प्राचीन ग्रंथों में इसे नए वर्ष और नई ऊर्जा के संचार का समय भी माना गया था। माया सभ्यता की बात करें तो पाते हैं कि माया सभ्यता (Chichen Itza) मेक्सिको में माया सभ्यता द्वारा निर्मित ‘एल कास्टिलो’ पिरामिड विषुव के सटीक ज्ञान का अद्भुत प्रमाण है। विषुव के दिन ढलते सूर्य की रोशनी से पिरामिड की सीढ़ियों पर एक ‘रेंगते हुए सांप’ (Kukulkan) कुलकुलकान की आकृति बनती है, जो प्राचीन खगोलीय सटीकता को दर्शाती है। और इसको अगर ईरानी प्राचीन खगोलीय दृष्टि से देखें तो पाते हैं कि ईरानी नववर्ष (Nowruz) नौरोज, या फारसी कैलेंडर में मार्च विषुव को ‘नौरूज़’ के रूप में मनाया जाता है, जो 3,000 से अधिक वर्षों से निरंतर जारी है।
विषुव क्या होता है।?
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला ( तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी अपने घूर्णन अक्ष पर 23.5 डिग्री पर झुकी हुई होते हुए ही प्रतिदिन एक बार पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, जिस कारण हमें आभास होता है कि सूर्य,पूर्व दिशा में उदय होता है और घूमते हुए ही आगे बढ़ते हुए ही पृथ्वी, वर्ष में एक बार सूर्य की परिक्रमा भी पूरी करती है, जिससे एक काल्पनिक डिस्क बनती है जिसे कक्षीय तल या क्रांतिवृत्त तल कहते हैं, इसे पृथ्वी का अक्षीय झुकाव या तिरछापन कहा जाता है । और पृथ्वी का अक्षीय झुकाव पूरे वर्ष एक जैसा रहता है,और उत्तरी ध्रुव हमेशा ध्रुव तारा (पोलरिस) की ओर इंगित करता है,जबकि दक्षिणी ध्रुव (पोलारिस ऑस्ट्रेलिस) के पास कोई उतना ब्राइट पोल स्टार नहीं है बल्कि अपेक्षाकृत मंद तारा ‘सिग्मा ऑक्टेंटिस’ वहां स्थित है,जो उसके ओर इंगित करता है,लेकिन यह पोलारिस (Polaris ) का दक्षिणी समकक्ष नहीं है। साथ ही पृथ्वी अपनी कक्षा में यात्रा भी करती है, इसलिए सूर्य के सापेक्ष इसका झुकाव बदलता रहता है। एवं साल के छह महीने उत्तरी ध्रुव, सूर्य की ओर झुका रहता है और सूर्य उत्तरी गोलार्ध के ऊपर स्थित होता है,बाकी छह महीने दक्षिणी ध्रुव,सूर्य की ओर झुका रहता है और सूर्य दक्षिणी गोलार्ध के लगभग ठीक ऊपर स्थित होता है,लेकिन विषुव के दौरान साल में केवल दो ही ऐसे क्षण होते हैं जब कोई भी ध्रुव, सूर्य की ओर इंगित नहीं करता बल्कि सूर्य पृथ्वी के भूमध्य रेखा के लगभग ठीक ऊपर स्थित होता है। यही क्षण विषुव कहलाते हैं। जिस कारण से मार्च विषुव 19 से 21 मार्च के बीच कभी भी होता है और सितंबर विषुव 21 से 24 सितंबर के बीच कभी भी होता है। जैसा कि इस वर्ष का मार्च विषुव 20 मार्च 2026 को है।खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उत्तरी गोलार्ध में, मार्च विषुव को वसंत विषुव या वर्नल विषुव के नाम से भी जाना जाता है और सितंबर विषुव को शरद विषुव या ऑटमनल विषुव कहा जाता है एवम् दक्षिणी गोलार्ध में, नाम इसके विपरीत हैं। और विषुव के दिन, किसी भी स्थान पर, दिन और रात की लंबाई लगभग बराबर होती है।
आईए अब इसको,थोड़ा सा विस्तारपूर्वक समझने का प्रयास करते हैं।
मार्च विषुव/ वसंत विषुव 2026,

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि हर साल दो विषुव होते हैं , एक मार्च में और दूसरा सितंबर में। मार्च में सूर्य, भूमध्य रेखा को दक्षिण से उत्तर की ओर पार करता है।
क्या होता है मार्च विषुव में।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव के दिन, पृथ्वी की धुरी, सूर्य की ओर न झुकी होती है और न दूर बल्कि सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर लगभग लंबवत पड़ती हैं। क्योंकि इस दौरान सूर्य, खगोलीय भूमध्य रेखा को पार करता है और मार्च विषुव वह क्षण है जब सूर्य आकाशीय भूमध्य रेखा (पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ऊपर आकाश में खींची गई एक काल्पनिक रेखा) को दक्षिण से उत्तर की ओर पार करता है । वैसे तो यह घटना हर साल 19, 20 या 21 मार्च में से किसी एक विशेष तारीख को घटित होती है। लेकिन इस बार वर्ष 2026 में यह महत्वपूर्ण खगोलीय घटना 20 मार्च 2026 को घटित होने जा रही है।
विषुव का समय और तिथि क्या होगी।?
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि भारत में शुक्रवार, 20 मार्च 2026,को 20:16 IST
( 08:16 PM ) एवम्
यह शुक्रवार, 20 मार्च 2026, 14:46 UTC के बराबर पर घटित होगी।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी की धुरी, सूर्य के चारों ओर पृथ्वी के पथ द्वारा निर्मित एक काल्पनिक समतल, क्रांतिवृत्त के सापेक्ष लगभग 23.5° के कोण पर झुकी हुई है, जिसके कारण उपसौर बिंदु वर्ष भर,उत्तर और दक्षिण की ओर गति करता रहता है। जून में, उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है,और उपसौर बिंदु भूमध्य रेखा के उत्तर में होता है। जैसे-जैसे पृथ्वी अपनी कक्षा के विपरीत दिशा की ओर बढ़ती है, जहाँ वह दिसंबर में पहुँचती है , दक्षिणी गोलार्ध को धीरे-धीरे अधिक सूर्यप्रकाश प्राप्त होता है, और उपसौर बिंदु दक्षिण की ओर गति करता है ।
इसे “विषुव” क्यों कहा जाता है?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव के दिनों में , पृथ्वी की धुरी, सूर्य की किरणों के लंबवत होती है , जिसका खगोलीय मतलब है कि पृथ्वी के सभी क्षेत्रों को लगभग समान घंटों तक सूर्य का प्रकाश प्राप्त होता है। या कुछ यूं कहें कि, सैद्धांतिक रूप में,पूरी दुनिया में रात और दिन की लंबाई लगभग बराबर होती है, इसी कारण इसे “विषुव” कहा जाता है,

खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार ,विषुव और ऋतु का भी खगोलीय संबंध होता है, मार्च और सितंबर में पड़ने वाले विषुव, पृथ्वी पर खगोलीय वसंत और शरद ऋतुओं की शुरुआत का प्रतीक हैं । मार्च में पड़ने वाला विषुव उत्तरी गोलार्ध में खगोलीय वसंत ऋतु की शुरुआत और भूमध्य रेखा के दक्षिण में शरद ऋतु की शुरुआत का प्रतीक होता है।
विषुव की तिथियों में बदलाव क्यों होता है?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव और संक्रांति की तिथियां भिन्न होती हैं, क्योंकि हमारे कैलेंडर में एक वर्ष की लंबाई, उष्णकटिबंधीय वर्ष की लंबाई से बिल्कुल मेल नहीं खाती है, यानी पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा पूरी करने में लगने वाला समय, ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार एक सामान्य वर्ष में 365 दिन और एक लीप वर्ष में 366 दिन होते हैं । हालांकि, हमारी पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करने में लगभग 365.242199 दिन लेती है, इसका मतलब होता है कि विषुव और संक्रांति का समय धीरे-धीरे ग्रेगोरियन कैलेंडर से अलग होता जाता है , और संक्रांति हर साल लगभग 6 घंटे बाद होती है, अंततः यह अंतर इतना बढ़ जाता है कि यह अगली तिथि पर पड़ता है,कैलेंडर को उष्णकटिबंधीय वर्ष के अनुरूप करने के लिए, लगभग हर चार साल में एक लीप दिवस जोड़ा जाता है। ऐसा होने पर, विषुव और संक्रांति की तिथियां फिर से पहले वाली तिथि पर स्थानांतरित हो जाती हैं मार्च विषुव उत्तरी गोलार्ध में वसंत विषुव (वर्नल इक्विनॉक्स) और दक्षिणी गोलार्ध में शरद विषुव (ऑटम इक्विनॉक्स) होता है, और यह खगोलीय वसंत ऋतु के पहले दिन का प्रतीक है, साथ ही
उत्तरी गोलार्ध में निवास करने वाले लोगों द्वारा मार्च विषुव को खगोलीय वसंत ऋतु की शुरुआत के रूप में उपयोग करते हैं, जो जून संक्रांति पर समाप्त होता है, जब खगोलीय ग्रीष्म ऋतु शुरू होती है, हालाँकि, वास्तविकता में, विषुव एक विशिष्ट क्षण में होता है जब सूर्य आकाशीय भूमध्य रेखा को पार करता है, जो पृथ्वी की भूमध्य रेखा के ऊपर आकाश में खींची गई एक काल्पनिक रेखा है ,और सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर जाता है,इस समय, पृथ्वी की धुरी न तो सूर्य से दूर झुकी हुई है और न ही सूर्य की ओर, बल्कि सूर्य की किरणों के लंबवत होती है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विषुव नाम लैटिन शब्दों ‘एक्वस’ (समान) और ‘नॉक्स’ (रात) से लिया गया है। लेकिन तकनीकी रूप में देखा जाए तो पूरी तरह से दिन और रात बराबर नहीं हो सकते हैं। क्योंकि वास्तविकता में पृथ्वी के अधिकांश स्थानों पर विषुव के दौरान रात की तुलना में दिन का उजाला थोड़ा सा अधिक होता है। इसके दो कारण हैं ,सूर्योदय और सूर्यास्त की परिभाषा और सूर्य के प्रकाश का वायुमंडलीय अपवर्तन। भूमध्य रेखा को छोड़कर पृथ्वी के अधिकांश स्थानों पर वर्ष में दो बार लगभग बराबर दिन और रात होते हैं। इस घटना की तिथि, जिसे इक्विलक्स भी कहा जाता है , उस स्थान के अक्षांश पर निर्भर करती है और विषुव से कुछ दिन पहले या बाद में हो सकती है।
क्या होता है खगोलीय क्रॉसिंग।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय क्रॉसिंग जब कहा जाता है जब सूर्य दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध की ओर बढ़ते हुए ‘खगोलीय भूमध्य रेखा’ को पार करता है। इसे ‘First Point of Aries’ (मेष बिंदु) भी कहा जाता था, हालांकि वर्तमान में प्रीसेशन (Precession) या अयन चलन के कारण यह मीन राशि (Pisces) में स्थित है।
क्या होता है अयन-चलन।?

खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोल का विषुवत-वृत्त और क्रांतिवृत्त एक-दूसरे के साथ करीब 23.5 अंशो पर (ठीक-ठीक कहें तो 23. 27 का) कोण बनाते हैं, जो सदैव लगभग स्थिर बना रहता है। कांतिवृत्त और विषुवत-वृत्त जिन दो बिंदुओं में एक-दूसरे को काटते हैं उन्हें विषुव-बिंदु (इक्विनोक्सेस) कहते हैं। एक को बसंत विषुब कहते है और दूसरे को शरद विषुब। वसंत विषुब को मेष के चिह्न से और शरद विषुब को तुला के चिह्न से दर्शाया जाता है। इन दो विषुव-बिंदुओं के धीरे-धीरे पीछे संरकने को ही अयन-चलन (प्रिसेशन ऑफ इक्विनीक्सेस) कहते हैं।
क्यों होता है ऐसा ।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस घटना का खगोल भौतिक कारण है। हमारी पृथ्वी,दोनों ध्रुवों पर कुछ चपटी और भूमध्य रेखा पर कुछ फूली हुई है। या कुछ यूं कहें कि पृथ्वी एक गोल नहीं, बल्कि एक गोलाभ ( जियोइड) है। दूसरी बात यह है कि भूमध्यरेखा पृथ्वी का मुख्य तल है, मगर सूर्य तथा चंद्र,कांतिवृत्त के तल में यात्रा करते हैं ,अपवाद हैं तो केवल दो बिंदु, वसंत विषुव-बिंदु और शरद विषुब-बिंदु ।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उपर्युक्त स्थितियों में सूर्य और चंद्र का गुरुत्वाकर्षण भूमध्यरेखा (विषुव-वृत्त) और कांतिवृत्त के तलों को एक-दूसरे से मिलाने के प्रयास में रखता है, मगर पृथ्वी का अक्ष-घूर्णन ऐसा नहीं होने देता। क्रांतिवृत्त और विषुव-वृत्त के तलों में करीब लगभग 23.5 अंशों का कोण सदैव बना रहता है और परिणाम यह होता है कि, पृथ्वी ही अपनी धुरी पर चक्कर लगाते हुए लट्टू की तरह डोलती भी रहती है। पृथ्वी की धुरी का सिरा कांतिवृत्त के ध्रुव (कदंब) का 23.5 अंशों के अंतर से धीरे-धीरे चक्कर लगाता रहता है। इस प्रकार, पृथ्वी की धुरी का सिरा करीब 25,800 वर्षों में कदंब का एक पूर्ण चक्कर लगाता है। यही वजह है कि पृथ्वी की धुरी का सिरा आकाश के जिस ध्रुव बिंदु की ओर निर्देश करता है वह धीरे-धीरे अपना स्थान बदलते हुए करीब 25,800 वर्षों में एक पूर्ण चक्कर लगाता है और सूर्य व चंद्र के गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी के लट्टू की तरह डोलने का दूसरा परिणाम यह होता है कि विषुव बिंदु धीरे धीरे क्रान्तिवृत पर पीछे, सूर्य की वार्षिक गति की विपरीत दिशा में सरकते रहते हैं, मगर क्रान्तिवृत और विषुव वृत्त के बीच लगभग 23.5 अंशों का कोणीय अंतर कायम रहता है, खगोल विज्ञान की भाषा में विषुव बिंदुओं के इसी पश्चमगम को अयन चलन कहा जाता हैं।
वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत के खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि खगोलीय विषुववृत्त और क्रान्तिवृत ( रविपथ) जिन दो बिंदुओं में एक दूसरे को काटते हैं उन्हें विषुव ( इक्विनोक्सेस) कहते हैं, साथ ही प्राचीन कालीन भारतीय खगोल ग्रंथों में इनके लिए क्रांतिपात शब्द का भी प्रयोग किया गया है, सूर्य जब इस विषुव बिंदुओं पर पहुंचता है तब दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। (इक्विनोसेक्स का अर्थ ही है, एक समान दिन और रात) या कुछ यूं कहें कि ‘Equinox’ शब्द लैटिन के aequus (बराबर) और nox (रात) से बना है। इस दिन पूरी पृथ्वी पर दिन और रात लगभग 12-12 घंटे के होते हैं साथ ही तकनीकी बारीकी की बात करें तो पाते हैं कि अपवर्तन (Refraction) के कारण दिन, रात से कुछ मिनट बड़ा महसूस हो सकता है, लेकिन जब एकदम बराबर होते हैं तो जिसे इक्विलक्स (‘Equilux’) कहा जाता है। लेकिन विषुव में इसका एक मुख्य पहलु होता है कि ऋतु परिवर्तन, जैसा कि उत्तरी गोलार्ध (जैसे भारत) में खगोलीय बसंत ऋतु (Spring) की आधिकारिक शुरुआत होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध (जैसे ऑस्ट्रेलिया) में खगोलीय शरद ऋतु (Autumn) शुरू होती है। एक और कारण है कि बसंत विषुव बिंदु ( मीन राशि) से सूर्य उत्तरायण में पहुंचता है, और शरद विषुव बिंदु ( कन्या राशि) से दक्षिणायन में अग्रसर होता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सूर्य, आकाश (खगोल या भागोल) के जिस पथ में यात्रा करता है, उसे ही रविपथ या क्रांतिवृत्त (इक्लिप्टिक) कहते हैं, यह क्रान्तिवृत खगोल के विषुववृत्त के साथ 23½° या 23.5 डिग्री का कोण बनाता है,चंद्र और ग्रह ठीक क्रांतिवृत्त या रविपथ में यात्रा नहीं करते। बल्कि वे क्रांतिवृत्त के नजदीक के विविध पथों में यात्रा करते हैं। वे तमाम पथ क्रांतिवृत्त से आठ से दस अंश तक दूर के एक पट्टे में रहते हैं उस पूरे पट्टे को राशिचक्र (जोडियक) कहते हैं।
मार्च विषुव के कारण ध्रुवों पर क्या स्थिति होगी।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उत्तरी ध्रुव पर इस दिन 6 महीने के ‘दिन’ की शुरुआत होती है, जबकि दक्षिणी ध्रुव पर 6 महीने की ‘रात’ शुरू हो जाती है। और अगर पृथ्वी पर सौर ज्यामिति की बात है तो हम पाते हैं कि इस दिन सूर्य लगभग ठीक पूर्व (East) में उगता है और लगभग ठीक पश्चिम (West) में अस्त होता है।
क्या होता है मार्च विषुव (March Equinox) के पीछे का खगोल विज्ञान। ?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी की अपनी धुरी पर झुकाव और सूर्य के चारों ओर उसकी परिक्रमा के सटीक तालमेल पर आधारित है यह खगोलीय संयोजन। इसे और ज्यादा आसानी से समझने के लिए हमें अंतरिक्ष के इन तीन मुख्य सिद्धांतों को देखना होगा।
पहला है,पृथ्वी का अक्षीय झुकाव (Axial Tilt)
पृथ्वी अपनी धुरी पर सीधी खड़ी न होकर लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई है। साल के अधिकांश समय, पृथ्वी का उत्तरी या दक्षिणी ध्रुव, सूर्य की ओर थोड़ा झुका रहता है, जिसके कारण ही मौसम बदलते हैं और दूसरी मुख्य बात है कि विषुव का क्षण, मार्च विषुव वह बिंदु है जब पृथ्वी का यह झुकाव,सूर्य की ओर न होकर उसके ‘समानांतर’ हो जाता है। इस स्थिति में, सूर्य की किरणे सीधे भूमध्य रेखा (Equator) पर लगभग 90° के कोण (Vertical) पर गिरती हैं। और तीसरी प्रमुख बात है कि खगोलीय भूमध्य रेखा(Celestial Equator) का खगोल विज्ञान में पारगमन, यदि हम पृथ्वी की भूमध्य रेखा को अंतरिक्ष में चारों ओर फैला दें, तो उसे ‘खगोलीय भूमध्य रेखा’ कहते हैं। इसी तरह, सूर्य का आकाश में जो आभासी रास्ता है, उसे क्रांतिवृत्त (Ecliptic) कहा जाता है। खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, “विषुव वह समय है जब सूर्य का रास्ता (Ecliptic) और खगोलीय भूमध्य रेखा एक-दूसरे को काटते हैं। 20 मार्च 2026 को सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर जाते हुए इस काल्पनिक रेखा को पार करेगा ,जिसे ‘वसंत संपात बिंदु’ (Vernal Equinox Point) भी कहते हैं।”
क्या होता है प्रकाश-वृत्त (Circle of Illumination)।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि प्रकाश-वृत्त (Circle of Illumination) पृथ्वी पर जो रेखा दिन और रात के हिस्से को अलग करती है, उसे ‘प्रकाश-वृत्त’ कहा जाता है।
सामान्य दिनों में यह वृत्त ध्रुवों से थोड़ा हटकर होता है। लेकिन

विषुव के दिन, यह रेखा सीधे उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक जाती है। यही कारण है कि इस दिन पृथ्वी के लगभग हर कोने पर सूर्य का प्रकाश समान रूप से लगभग 12 घंटे के लिए मिलता है।
क्या होता है ‘सबसोलर पॉइंट’ (Subsolar Point) का महत्व।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि ‘सबसोलर पॉइंट’ (Subsolar Point) का महत्व बहुत ही ख़ास होता है क्योंकि 20 मार्च 2026 को रात 08:16 PM (IST) पर, सूर्य का ‘सबसोलर पॉइंट’ (वह बिंदु जहाँ सूर्य बिल्कुल सिर के ऊपर होता है) ठीक भूमध्य रेखा पर होगा।
जैसे-जैसे पृथ्वी घूमती है, यह बिंदु पश्चिम की ओर बढ़ता जाता है और इसी स्थिति के कारण ही ध्रुवों पर सूर्य क्षितिज (Horizon) के समानांतर चलता हुआ दिखाई देता है, जोकि न तो पूरी तरह उदय, न ही पूरी तरह अस्त होता है।
क्या होता है उपसौर और अपसौर का अंतर।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि उपसौर और अपसौर का अंतर में याद रखने वाली बात यह है कि विषुव का संबंध सूर्य से पृथ्वी की ‘दूरी’ से नहीं है, बल्कि उसके ‘झुकाव’ से है। पृथ्वी अपनी कक्षा में जहाँ भी हो, विषुव केवल तभी होता है जब सूर्य की रोशनी दोनों गोलार्धों में लगभग बराबर बंटती है।
खगोलविद अमर पाल सिंह के अनुसार, यह घटना यह समझने का सबसे अच्छा मौका है कि हमारा ग्रह अंतरिक्ष में किस तरह एक ‘लट्टू’ की तरह घूमते हुए सूर्य की परिक्रमा कर रहा है।
बराबर दिन और रात में क्या है अपवाद।?
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि तकनीकी खगोलीय अपवाद की बात करें तो हम पाते हैं कि वायुमंडलीय अपबर्तन (Atmospheric Refraction) के कारण हमारी आँखों के लिए दिन, रात से लगभग 6-7 मिनट लंबा हो सकता है। इसका कारण पृथ्वी का वायुमंडल है, जो सूर्य की रोशनी को मोड़ (Refract) देता है, जिससे सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद भी थोड़ी सी देर तक रोशनी दिखाई देती है। लेकिन इस दौरान साधारण खगोलीय दृष्टि से दिन और रात लगभग बराबर ही होते हैं,
*पृथ्वी पर क्या होगा इसका असर ।?*
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि पृथ्वी पर इसके निम्न असर होंगे जैसे कि ऋतु परिवर्तन,उत्तरी गोलार्ध (भारत) में खगोलीय बसंत ऋतु (Spring) का आधिकारिक प्रारंभ होगा,जबकि दक्षिणी गोलार्ध में पतझड़ (Autumn) शुरू होगा। ध्रुवों पर बड़ा बदलाव होगा, उत्तरी ध्रुव पर 6 महीने की लंबी रात समाप्त होगी और सूर्योदय होगा। वहीं, दक्षिणी ध्रुव पर 6 महीने के दिन के बाद पहली बार सूर्यास्त होगा। दिशा का शुद्ध ज्ञान, केवल इसी दिन सूर्य ठीक पूर्व लगभग (90°) से उदय होता है और ठीक पश्चिम लगभग (270°) में अस्त होता है। अन्य दिनों में यह थोड़ा उत्तर (Uttarayan) या दक्षिण (Dakshinayan) की ओर होता है। और साथ ही कुछ ही जगहों पर शून्य छाया (Zero Shadow) भी घटित होगा भूमध्य रेखा पर रहने वाले लोगों के लिए दोपहर में सूर्य ठीक सिर के ऊपर होगा, जिससे वर्टिकल वस्तुओं की परछाई न्यूनतम या लगभग शून्य हो जाएगी। एवम् प्रवास (Migration) पर भी असर पड़ता है, पक्षियों और जानवरों के लिए यह दिन एक ‘जैविक घड़ी’ (Biological Clock) का काम करता है, जो उन्हें प्रवास और प्रजनन के लिए संकेत देता है। खगोलविद अमर पाल सिंह ने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि इस घटना को समझने के लिए किसी जटिल यंत्र की आवश्यकता नहीं है, आप बस सूर्योदय और सूर्यास्त के समय अपनी परछाई की दिशा और लंबाई को नोट करके इस बदलाव को महसूस कर सकते हैं।
*कैसे कर सकते हैं खगोलीय गणनात्मक अवलोकन ।?*
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि यह महत्वपूर्ण समय होता है क्योंकि इस दौरान कुछ जगहों पर शून्य छाया (Zero Shadow) भी घटित होता है, जैसे कि भूमध्य रेखा पर स्थित स्थानों पर दोपहर के समय सूर्य लगभग बिल्कुल सिर के ऊपर होता है, जिससे किसी भी सीधी खड़ी हुई चीज़ की परछाई कुछ समय के लिए गायब सी हो जाती है। या कुछ यूं कहें कि शाया भी कुछ देर के लिए साथ छोड़ देता है, साथ ही सैटेलाइट आउटेज भी होने की संभावना बनी रहती है, क्योंकि इस दौरान सूर्य, पृथ्वी के सैटेलाइट्स और ग्राउंड स्टेशनों के साथ एक सीधी रेखा में आ सकते हैं जिससे सोलर आउटेज (Solar outage) के कारण संचार में मामूली सा व्यवधान आ सकता है जोकि तकनीकी रूप से खगोलीय डाटा को प्रभावित कर सकते हैं लेकिन यह नगण्य है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि विश्व भर की कई संस्कृतियाँ मार्च विषुव/बसंत विषुव को एक त्यौहार के रूप में भी मनाती रहीं हैं,खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि इस प्रकार की प्राकृतिक खगोलीय घटनाएं महत्वपूर्ण खगोलीय संतुलन का महापर्व होती हैं उनमें से एक विशेष होता है मार्च विषुव, क्योंकि जब पृथ्वी पर दिन और रात होंगे लगभग बराबर,और 20 मार्च 2026 को प्रकृति का एक अद्भुत संतुलन जो देखने को मिलेगा। वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला के खगोलविद अमर पाल सिंह ने जानकारी साझा करते हुए बताया कि इस प्रकार की खगोलीय घटनाओं का कुछ ख़ास वैज्ञानिक महत्व होता है जैसे कि तकनीकी रूप से सूर्य ‘खगोलीय भूमध्य रेखा’ को पार कर उत्तरी गोलार्ध में प्रवेश करेगा इसीलिए यह क्षण दिशा मापन और सौर ज्यामिति को समझने के लिए गणितीय रूप से सबसे सटीक समय होता है।
खगोलविद अमर पाल सिंह ने बताया कि सही ज्ञान सभी समस्याओं का समाधान और यही है विज्ञान। खगोलविद अमर पाल सिंह ने आम जनमानस और विद्यार्थियों,विशेषकर विज्ञान के विद्यार्थियों से अपील की है कि वे इस दिन सौर घड़ियों और परछाई के माध्यम से पृथ्वी की गति को समझने का भी प्रयास कर सकते हैं ।
निःशुल्क,किन्हीं भी विशेष खगोलीय घटनाओं से संबंधित विशेष महत्वपूर्ण जानकारियों हेतु संपर्क सूत्र।
© खगोलविद अमर पाल सिंह।
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वीर बहादुर सिंह नक्षत्रशाला (तारामण्डल) गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत।🌍🇮🇳🙏🙏🌟⭐💫✨💥
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